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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 7: उत्तर काण्ड
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सर्ग 59: ययाति का अपने पुत्र पूरु को अपना बुढ़ापा देकर बदले में उसका यौवन लेना और भोगों से तृप्त होकर पुनः दीर्घकाल के बाद उसे उसका यौवन लौटा देना, पूरु का अपने पिता की गद्दी पर अभिषेक तथा यदु को शाप
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श्लोक 17
श्लोक
7.59.17
तमेवमुक्त्वा राजर्षि: पूरुं राज्यविवर्धनम्।
अभिषेकेण सम्पूज्य आश्रमं प्रविवेश ह॥ १७॥
अनुवाद
यदु से ऐसा कहकर राजर्षि यया ने राज्य का विस्तार करने वाले पुरुषों का अभिषेक करके वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश किया ॥17॥
Saying this to Yadu, Rajarishi Yaya, after anointing the Purushas who expanded the kingdom, entered Vanaprastha Ashram. 17॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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