श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 57: वसिष्ठ का नूतन शरीर धारण और निमि का प्राणियों के नयनों में निवास  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  7.57.6 
तद्धि तेजस्तु मित्रस्य उर्वश्या: पूर्वमाहितम्।
तस्मिन् समभवत् कुम्भे तत्तेजो यत्र वारुणम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
वह मित्र का तेज था, जो उर्वशी के निमित्त उस कलश में पहले से ही स्थित था। तत्पश्चात् वरुणदेव का तेज भी उस कलश में सम्मिलित हो गया॥6॥
 
‘That was the radiance of Mitra, which had already been placed in that pot for the sake of Urvashi. Thereafter, the radiance of the god Varuna also got added to that pot.॥ 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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