श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 57: वसिष्ठ का नूतन शरीर धारण और निमि का प्राणियों के नयनों में निवास  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  7.57.5 
पूर्वं समभवत् तत्र अगस्त्यो भगवानृषि:।
नाहं सुतस्तवेत्युक्त्वा मित्रं तस्मादपाक्रमत्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
‘पहले उस घड़े से महर्षि भगवान अगस्त्य उत्पन्न हुए और अपने मित्र से ‘मैं तुम्हारा पुत्र नहीं हूँ’ ऐसा कहकर वे वहाँ से चले गए ॥5॥
 
‘First, the great sage Bhagwan Agastya was born from that pot and after telling his friend, “I am not your son”, he went away from there. ॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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