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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 57: वसिष्ठ का नूतन शरीर धारण और निमि का प्राणियों के नयनों में निवास  »  श्लोक 17-18h
 
 
श्लोक  7.57.17-18h 
एवमुक्त्वा तु विबुधा: सर्वे जग्मुर्यथागतम्।
ऋषयोऽपि महात्मानो निमेर्देहं समाहरन्॥ १७॥
अरणिं तत्र निक्षिप्य मथनं चक्रुरोजसा।
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर सभी देवता जिस प्रकार आये थे, उसी प्रकार चले गये। तब महर्षियों ने निमिक के शरीर को पकड़ लिया और उस पर अग्नि-कुंड रखकर उसे जोर-जोर से मथना आरम्भ कर दिया।
 
Having said this all the gods went away in the same manner as they had come. Then the great sages caught hold of Nimik's body and placing a fire-pier on it began to churn it with force.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)