श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 57: वसिष्ठ का नूतन शरीर धारण और निमि का प्राणियों के नयनों में निवास  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  7.57.16 
त्वत्कृते च निमिष्यन्ति चक्षूंषि पृथिवीपते।
वायुभूतेन चरता विश्रामार्थं मुहुर्मुहु:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
हे पृथ्वीपति! वायु रूप में विचरण करते समय आपके संग से उत्पन्न हुई थकान दूर होकर जीवों की आँखें विश्राम पाने के लिए बार-बार बंद हो जाएँगी।॥16॥
 
Lord of the Earth! The eyes of the living beings will close again and again to get rest after getting rid of the fatigue caused by your association while moving in the form of air.'॥ 16॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas