श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 56: ब्रह्माजी के कहने से वसिष्ठ का वरुण के वीर्य में आवेश, वरुण का उर्वशी के समीप एक कुम्भ में अपने वीर्य का आधान तथा मित्र के शाप से उर्वशी का भूतल में राजा पुरुरवा के पास रहकर पुत्र उत्पन्न करना  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  7.56.9-10 
तमुवाच ततो ब्रह्मा स्वयंभूरमितप्रभ:॥ ९॥
मित्रावरुणजं तेज आविश त्वं महायश:।
अयोनिजस्त्वं भविता तत्रापि द्विजसत्तम।
धर्मेण महता युक्त: पुनरेष्यसि मे वशम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
तब अमित तेजस्वी स्वयंभू ब्रह्मा ने उनसे कहा - 'महायशस्वी द्विजश्रेष्ठ! तुम मित्र और वरुण द्वारा छोड़े गए वीर्य में प्रवेश करो। वहाँ जाकर भी तुम अयोनिज रूप में जन्म लोगे और महान धर्म से युक्त होकर पुत्र रूप में मेरे वश में आओगे (मेरा पुत्र होने के कारण तुम्हें पहले की तरह प्रजापति का पद प्राप्त होगा।)'॥
 
Then Amit Tejasvi Swayambhu Brahma said to him - 'Mahayashasvi Dwijashreshtha! You enter into the semen left by Mitra and Varuna. Even after going there, you will be born in the form of ayonij and imbued with great religion, you will come under my control in the form of a son (because of being my son, you will get the post of Prajapati as before.)'॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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