श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 56: ब्रह्माजी के कहने से वसिष्ठ का वरुण के वीर्य में आवेश, वरुण का उर्वशी के समीप एक कुम्भ में अपने वीर्य का आधान तथा मित्र के शाप से उर्वशी का भूतल में राजा पुरुरवा के पास रहकर पुत्र उत्पन्न करना  »  श्लोक 8-9h
 
 
श्लोक  7.56.8-9h 
सर्वेषां देहहीनानां महद् दु:खं भविष्यति।
लुप्यन्ते सर्वकार्याणि हीनदेहस्य वै प्रभो॥ ८॥
देहस्यान्यस्य सद्भावे प्रसादं कर्तुमर्हसि।
 
 
अनुवाद
प्रभु! सभी अशरीरी प्राणी महान दुःख भोगते हैं और भोगते रहेंगे; क्योंकि अशरीरी प्राणी के सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं। अतः आप मुझे दूसरा शरीर प्राप्त करने की कृपा करें।॥8 1/2॥
 
‘Prabhu! All the bodiless beings suffer and will continue to suffer great sorrow; because all the activities of a bodiless being are lost. Therefore, please bless me to obtain another body.’॥ 8 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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