श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 56: ब्रह्माजी के कहने से वसिष्ठ का वरुण के वीर्य में आवेश, वरुण का उर्वशी के समीप एक कुम्भ में अपने वीर्य का आधान तथा मित्र के शाप से उर्वशी का भूतल में राजा पुरुरवा के पास रहकर पुत्र उत्पन्न करना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  7.56.4 
तौ परस्परशापेन देहमुत्सृज्य धार्मिकौ।
अभूतां नृपविप्रर्षी वायुभूतौ तपोधनौ॥ ४॥
 
 
अनुवाद
सुमित्रानन्दन! वे पुण्यात्मा राजर्षि और ब्रह्मर्षि, जो तपस्वी थे, एक-दूसरे के शाप से शरीर त्यागकर वायु रूप हो गए॥4॥
 
Sumitranandan! By sacrificing their bodies due to each other's curse, those virtuous souls, Rajarshi and Brahmarshi, who were rich in penance, became Vayu form. 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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