श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 56: ब्रह्माजी के कहने से वसिष्ठ का वरुण के वीर्य में आवेश, वरुण का उर्वशी के समीप एक कुम्भ में अपने वीर्य का आधान तथा मित्र के शाप से उर्वशी का भूतल में राजा पुरुरवा के पास रहकर पुत्र उत्पन्न करना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  7.56.24 
अनेन दुष्कृतेन त्वं मत्क्रोधकलुषीकृता।
मनुष्यलोकमास्थाय कंचित् कालं निवत्स्यसि॥ २४॥
 
 
अनुवाद
‘तुम्हारे इस पाप के कारण तुम मेरे क्रोध से कलंकित होगे और तुम्हें कुछ समय के लिए मनुष्य लोक में जाकर रहना पड़ेगा।॥ 24॥
 
‘Due to this sin of yours, you will be tainted by my anger and will have to go and live in the human world for some time.॥ 24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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