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श्लोक 7.56.22  |
उर्वशी त्वगमत् तत्र मित्रो वै यत्र देवता।
तां तु मित्र: सुसंक्रुद्ध उर्वशीमिदमब्रवीत्॥ २२॥ |
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| अनुवाद |
| तत्पश्चात् उर्वशी उस स्थान पर गई जहाँ मित्रदेव बैठे थे। उस समय मित्रदेव अत्यन्त क्रोधित होकर उर्वशी से इस प्रकार बोले-॥22॥ |
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| ‘Thereafter Urvashi went to the place where the god Mitra was sitting. At that time Mitra became very angry and spoke to Urvashi in this manner -॥ 22॥ |
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