श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 56: ब्रह्माजी के कहने से वसिष्ठ का वरुण के वीर्य में आवेश, वरुण का उर्वशी के समीप एक कुम्भ में अपने वीर्य का आधान तथा मित्र के शाप से उर्वशी का भूतल में राजा पुरुरवा के पास रहकर पुत्र उत्पन्न करना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  7.56.22 
उर्वशी त्वगमत् तत्र मित्रो वै यत्र देवता।
तां तु मित्र: सुसंक्रुद्ध उर्वशीमिदमब्रवीत्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् उर्वशी उस स्थान पर गई जहाँ मित्रदेव बैठे थे। उस समय मित्रदेव अत्यन्त क्रोधित होकर उर्वशी से इस प्रकार बोले-॥22॥
 
‘Thereafter Urvashi went to the place where the god Mitra was sitting. At that time Mitra became very angry and spoke to Urvashi in this manner -॥ 22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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