श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 56: ब्रह्माजी के कहने से वसिष्ठ का वरुण के वीर्य में आवेश, वरुण का उर्वशी के समीप एक कुम्भ में अपने वीर्य का आधान तथा मित्र के शाप से उर्वशी का भूतल में राजा पुरुरवा के पास रहकर पुत्र उत्पन्न करना  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  7.56.17-18 
वरुणस्त्वब्रवीद् वाक्यं कन्दर्पशरपीडित:।
इदं तेज: समुत्स्रक्ष्ये कुम्भेऽस्मिन् देवनिर्मिते॥ १७॥
एवमुत्सृज्य सुश्रोणि त्वय्यहं वरवर्णिनि।
कृतकामो भविष्यामि यदि नेच्छसि सङ्गमम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर कामदेव के बाणों से पीड़ित वरुण ने कहा, 'हे सुन्दर एवं रूपवान सुश्रुणि! यदि तुम मेरे साथ समागम नहीं करना चाहती हो, तो मैं तुम्हारे समीप इस दिव्य पात्र में अपना वीर्य त्याग दूँगा और ऐसा करके मैं अपने ध्येय को प्राप्त करूँगा।'॥17-18॥
 
Hearing this, Varuna, afflicted by the arrows of Kamadeva, said, 'O beautiful and complexioned Sushruni! If you do not wish to have intercourse with me, then I shall release my semen in this divinely made pot near you and by doing so, I shall achieve my goal.'॥ 17-18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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