श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 56: ब्रह्माजी के कहने से वसिष्ठ का वरुण के वीर्य में आवेश, वरुण का उर्वशी के समीप एक कुम्भ में अपने वीर्य का आधान तथा मित्र के शाप से उर्वशी का भूतल में राजा पुरुरवा के पास रहकर पुत्र उत्पन्न करना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  7.56.14 
तां दृष्ट्वा रूपसम्पन्नां क्रीडन्तीं वरुणालये।
तदाविशत् परो हर्षो वरुणं चोर्वशीकृते॥ १४॥
 
 
अनुवाद
उस परम सुन्दरी अप्सरा को क्षीरसागर में नहाते और क्रीड़ा करते देखकर वरुण के हृदय में उर्वशी के लिए महान हर्ष उत्पन्न हुआ॥14॥
 
Seeing that most beautiful nymph bathing and playing in the ocean of milk, great joy appeared in Varun's heart for Urvashi. 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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