श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 56: ब्रह्माजी के कहने से वसिष्ठ का वरुण के वीर्य में आवेश, वरुण का उर्वशी के समीप एक कुम्भ में अपने वीर्य का आधान तथा मित्र के शाप से उर्वशी का भूतल में राजा पुरुरवा के पास रहकर पुत्र उत्पन्न करना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  7.56.11 
एवमुक्तस्तु देवेन अभिवाद्य प्रदक्षिणम्।
कृत्वा पितामहं तूर्णं प्रययौ वरुणालयम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्माजी से ऐसा कहकर उनके चरणों में प्रणाम करके और उनकी परिक्रमा करके वायुरूपी वसिष्ठजी वरुणलोक को चले गए॥11॥
 
After saying this to Brahmaji, after paying obeisance at his feet and circling around him, Vasishthaji in the form of air went to Varunlok. 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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