श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 54: राजा नृग का एक सुन्दर गड्ढा बनवाकर अपने पुत्र को राज्य दे स्वयं उसमें प्रवेश करके शाप भोगना  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  7.54.16-17 
प्राप्तव्यान्येव प्राप्नोति गन्तव्यान्येव गच्छति॥ १६॥
लब्धव्यान्येव लभते दु:खानि च सुखानि च।
पूर्वे जात्यन्तरे वत्स मा विषादं कुरुष्व ह॥ १७॥
 
 
अनुवाद
‘बेटा! पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार मनुष्य को केवल वही वस्तुएँ प्राप्त होती हैं जिनका वह अधिकारी है। वह वहीं जाता है जहाँ उसे जाना आवश्यक है तथा उसे केवल वही दुःख-सुख प्राप्त होते हैं जो उसके लिए नियत हैं; इसलिए तू दुःखी मत हो।’॥16-17॥
 
‘Son! According to the deeds done in the previous life, a man gets only those things which he is entitled to. He goes to those places where it is necessary for him to go and gets only those sorrows and happiness which are destined for him; therefore do not be sad.’॥ 16-17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)