श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 54: राजा नृग का एक सुन्दर गड्ढा बनवाकर अपने पुत्र को राज्य दे स्वयं उसमें प्रवेश करके शाप भोगना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  7.54.1 
रामस्य भाषितं श्रुत्वा लक्ष्मण: परमार्थवित्।
उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं राघवं दीप्ततेजसम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
श्री रामजी की यह वाणी सुनकर अध्यात्मवेत्ता लक्ष्मण हाथ जोड़कर तेजस्वी श्री रघुनाथजी से बोले-॥1॥
 
Upon hearing this speech of Shri Rama, the knower of spirituality, Lakshman, with folded hands, spoke to the radiant Sri Raghunathji -॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)