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ramayan 7.52.6-7: उन्होंने देखा कि श्री रघुनाथजी सिंहासन पर उदास होकर बैठे हैं और उनके दोनों नेत्र आँसुओं से भरे हुए हैं। अपने बड़े भाई को इस दशा में देखकर लक्ष्मण ने दुःखी मन से उनके दोनों चरण पकड़ लिए और हाथ जोड़कर तथा मन को एकाग्र करके करुण वाणी में बोले-॥6-7॥   |   ramayan सर्ग 7.52: अयोध्या के राजभवन में पहुँचकर लक्ष्मण का दुःखी श्रीराम से मिलना और उन्हें सान्त्वना देना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 52: अयोध्या के राजभवन में पहुँचकर लक्ष्मण का दुःखी श्रीराम से मिलना और उन्हें सान्त्वना देना  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  7.52.6-7 
स दृष्ट्वा राघवं दीनमासीनं परमासने।
नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां ददर्शाग्रजमग्रत:॥ ६॥
जग्राह चरणौ तस्य लक्ष्मणो दीनचेतन:।
उवाच दीनया वाचा प्राञ्जलि: सुसमाहित:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने देखा कि श्री रघुनाथजी सिंहासन पर उदास होकर बैठे हैं और उनके दोनों नेत्र आँसुओं से भरे हुए हैं। अपने बड़े भाई को इस दशा में देखकर लक्ष्मण ने दुःखी मन से उनके दोनों चरण पकड़ लिए और हाथ जोड़कर तथा मन को एकाग्र करके करुण वाणी में बोले-॥6-7॥
 
He saw that Shri Raghunathji was sitting sadly on a throne and both his eyes were filled with tears. Seeing his elder brother in this condition, Lakshmana held both his feet with a sad heart and with folded hands and concentrating his mind, he spoke in a pitiable voice -॥ 6-7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)