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ramayan 7.52.17: महात्मा लक्ष्मण की यह बात सुनकर मित्र-प्रेमी श्री रघुनाथजी ने बड़ी प्रसन्नता से सुमित्रापुत्र से कहा-॥17॥   |   ramayan सर्ग 7.52: अयोध्या के राजभवन में पहुँचकर लक्ष्मण का दुःखी श्रीराम से मिलना और उन्हें सान्त्वना देना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 52: अयोध्या के राजभवन में पहुँचकर लक्ष्मण का दुःखी श्रीराम से मिलना और उन्हें सान्त्वना देना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  7.52.17 
एवमुक्त: स काकुत्स्थो लक्ष्मणेन महात्मना।
उवाच परया प्रीत्या सौमित्रिं मित्रवत्सल:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
महात्मा लक्ष्मण की यह बात सुनकर मित्र-प्रेमी श्री रघुनाथजी ने बड़ी प्रसन्नता से सुमित्रापुत्र से कहा-॥17॥
 
Upon hearing Mahatma Lakshman say this, the friend-loving Sri Raghunatha said to Sumitra's son with great pleasure -॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)