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ramayan 7.51.5-6h: 'तब राजा ने उन दोनों महर्षियों का नम्रतापूर्वक अभिवादन किया। उन दोनों ने भी उन्हें आसन देकर, जल, फल-मूल आदि देकर उनका स्वागत किया। फिर वे ऋषियों के साथ वहीं बैठ गए।'   |   ramayan सर्ग 7.51: मार्ग में सुमन्त्र का दुर्वासा के मुख से सुनी हुर्इ भृगुऋषि के शाप की कथा कहकर तथा भविष्य में होनेवाली कुछ बातें बताकर दुःखी लक्ष्मण को शान्त करना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 51: मार्ग में सुमन्त्र का दुर्वासा के मुख से सुनी हुर्इ भृगुऋषि के शाप की कथा कहकर तथा भविष्य में होनेवाली कुछ बातें बताकर दुःखी लक्ष्मण को शान्त करना  »  श्लोक 5-6h
 
 
श्लोक  7.51.5-6h 
तौ मुनी तापसश्रेष्ठौ विनीतो ह्यभ्यवादयत्।
स ताभ्यां पूजितो राजा स्वागतेनासनेन च॥ ५॥
पाद्येन फलमूलैश्च उवास मुनिभि: सह।
 
 
अनुवाद
'तब राजा ने उन दोनों महर्षियों का नम्रतापूर्वक अभिवादन किया। उन दोनों ने भी उन्हें आसन देकर, जल, फल-मूल आदि देकर उनका स्वागत किया। फिर वे ऋषियों के साथ वहीं बैठ गए।'
 
‘Then the king greeted those two great sages with humility. Both of them also welcomed him by giving him a seat and offering him water and fruits and roots. Then he sat there with the sages. 5 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)