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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 51: मार्ग में सुमन्त्र का दुर्वासा के मुख से सुनी हुर्इ भृगुऋषि के शाप की कथा कहकर तथा भविष्य में होनेवाली कुछ बातें बताकर दुःखी लक्ष्मण को शान्त करना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  7.51.2 
पुरा नाम्ना हि दुर्वासा अत्रे: पुत्रो महामुनि:।
वसिष्ठस्याश्रमे पुण्ये वार्षिक्यं समुवास ह॥ २॥
 
 
अनुवाद
लक्ष्मण! बहुत समय पहले की बात है कि अत्रिपुत्र महर्षि दुर्वासा वशिष्ठ के पवित्र आश्रम में वर्षा ऋतु के चार महीने व्यतीत कर रहे थे।
 
Lakshmana! It happened long ago that the great sage Durvasa, son of Atri, was spending the four months of the rainy season at the holy hermitage of Vasishtha.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)