श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 48: सीता का दुःखपूर्ण वचन, श्रीराम के लिये उनका संदेश, लक्ष्मण का जाना और सीता का रोना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  7.48.5 
पुराहमाश्रमे वासं रामपादानुवर्तिनी।
अनुरुध्यापि सौमित्रे दु:खे च परिवर्तिनी॥ ५॥
 
 
अनुवाद
सुमित्रानंदन! पहले मैंने वनवास का कष्ट सहकर श्री राम के पदचिन्हों पर चलते हुए आश्रम में रहना पसन्द किया था॥5॥
 
Sumitra Nandan! Earlier I had preferred to endure the pain of exile and stay in the ashram following the footsteps of Shri Ram.॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)