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ramayan 7.48.21-22h: हे भोली-भाली एवं पतिव्रता स्त्री! मैंने तो पहले भी तुम्हारा सम्पूर्ण रूप नहीं देखा। मैंने तो केवल तुम्हारे चरण ही देखे हैं। फिर आज वन में श्री रामचन्द्रजी की अनुपस्थिति में मैं तुम्हें कैसे देख सकता हूँ?'   |   ramayan सर्ग 7.48: सीता का दुःखपूर्ण वचन, श्रीराम के लिये उनका संदेश, लक्ष्मण का जाना और सीता का रोना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 48: सीता का दुःखपूर्ण वचन, श्रीराम के लिये उनका संदेश, लक्ष्मण का जाना और सीता का रोना  »  श्लोक 21-22h
 
 
श्लोक  7.48.21-22h 
दृष्टपूर्वं न ते रूपं पादौ दृष्टौ तवानघे॥ २१॥
कथमत्र हि पश्याम रामेण रहितां वने।
 
 
अनुवाद
हे भोली-भाली एवं पतिव्रता स्त्री! मैंने तो पहले भी तुम्हारा सम्पूर्ण रूप नहीं देखा। मैंने तो केवल तुम्हारे चरण ही देखे हैं। फिर आज वन में श्री रामचन्द्रजी की अनुपस्थिति में मैं तुम्हें कैसे देख सकता हूँ?'
 
Innocent and devoted wife! I have never seen your complete form even before. I have seen only your feet. Then how can I look at you today in the absence of Shri Ramchandraji here in the forest?'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)