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ramayan 7.48.16: हे राजन! नगरवासियों के साथ धर्मानुसार आचरण करने से जो पुण्य प्राप्त होगा, वही तुम्हारे लिए उत्तम धर्म और यश है। पुरुषोत्तम! मुझे अपने शरीर की कोई चिंता नहीं है॥16॥   |   ramayan सर्ग 7.48: सीता का दुःखपूर्ण वचन, श्रीराम के लिये उनका संदेश, लक्ष्मण का जाना और सीता का रोना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 48: सीता का दुःखपूर्ण वचन, श्रीराम के लिये उनका संदेश, लक्ष्मण का जाना और सीता का रोना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  7.48.16 
यत्तु पौरजने राजन् धर्मेण समवाप्नुयात्।
अहं तु नानुशोचामि स्वशरीरं नरर्षभ॥ १६॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! नगरवासियों के साथ धर्मानुसार आचरण करने से जो पुण्य प्राप्त होगा, वही तुम्हारे लिए उत्तम धर्म और यश है। पुरुषोत्तम! मुझे अपने शरीर की कोई चिंता नहीं है॥16॥
 
‘O King! The merits that you will get by behaving in accordance with the Dharma towards the people of the city are the best Dharma and fame for you. Purushottam! I have no concern for my body.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)