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ramayan 7.48.13-14h: हे वीर! तुमने अपयश के भय से मुझे त्याग दिया है; अतः लोगों में तुम्हारी जो निन्दा हो रही है अथवा मेरे कारण जो अफ़वाहें फैल रही हैं, उनका निवारण करना मेरा कर्तव्य है; क्योंकि तुम ही मेरे परम आश्रय हो॥13 1/2॥   |   ramayan सर्ग 7.48: सीता का दुःखपूर्ण वचन, श्रीराम के लिये उनका संदेश, लक्ष्मण का जाना और सीता का रोना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 48: सीता का दुःखपूर्ण वचन, श्रीराम के लिये उनका संदेश, लक्ष्मण का जाना और सीता का रोना  »  श्लोक 13-14h
 
 
श्लोक  7.48.13-14h 
अहं त्यक्ता च ते वीर अयशोभीरुणा जने।
यच्च ते वचनीयं स्यादपवाद: समुत्थित:॥ १३॥
मया च परिहर्तव्यं त्वं हि मे परमा गति:।
 
 
अनुवाद
हे वीर! तुमने अपयश के भय से मुझे त्याग दिया है; अतः लोगों में तुम्हारी जो निन्दा हो रही है अथवा मेरे कारण जो अफ़वाहें फैल रही हैं, उनका निवारण करना मेरा कर्तव्य है; क्योंकि तुम ही मेरे परम आश्रय हो॥13 1/2॥
 
Valiant! You have abandoned me out of fear of disgrace; hence it is my duty to remove the criticism that is being made of you among the people or the rumours that are spreading because of me; because you are my ultimate refuge.॥ 13 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)