श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 47: लक्ष्मण का सीताजी को नाव से गङ्गाजी के उस पार पहुँचाकर बड़े दुःख से उन्हें उनके त्यागे जाने की बात बताना  »  श्लोक 13-15h
 
 
श्लोक  7.47.13-15h 
सा त्वं त्यक्ता नृपतिना निर्दोषा मम संनिधौ॥ १३॥
पौरापवादभीतेन ग्राह्यं देवि न तेऽन्यथा।
आश्रमान्तेषु च मया त्यक्तव्या त्वं भविष्यसि॥ १४॥
राज्ञ: शासनमादाय तथैव किल दौर्हृदम्।
 
 
अनुवाद
'तुम मेरे सामने निर्दोष सिद्ध हो चुकी हो, फिर भी राजा ने लोकनिंदा के भय से तुम्हें त्याग दिया है। देवि! तुम अन्य कोई विचार मत करो। अब राजा की आज्ञा मानकर और तुम्हारी इच्छा को यथावत मानकर मैं तुम्हें आश्रमों में ले जाकर वहीं छोड़ दूँगा।॥13-14 1/2॥
 
‘You have been proved innocent in front of me, yet the king has abandoned you fearing public condemnation. Devi! Do not think anything else. Now, obeying the king's order and considering your wish to be the same, I will take you to the ashrams and leave you there.॥ 13-14 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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