श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 4: रावण आदि का जन्म और उनका तप के लिये गोकर्ण - आश्रम में जाना  »  श्लोक 28-29h
 
 
श्लोक  7.4.28-29h 
अपश्यदुमया सार्धं रुदन्तं राक्षसात्मजम्।
कारुण्यभावात् पार्वत्या भवस्त्रिपुरसूदन:॥ २८॥
तं राक्षसात्मजं चक्रे मातुरेव वय:समम्।
 
 
अनुवाद
'यह सुनकर पार्वती सहित शिवजी ने उस रोते हुए राक्षस बालक की ओर देखा। उसकी दयनीय दशा देखकर माता पार्वती के हृदय में करुणा का स्रोत उमड़ पड़ा और उनकी प्रेरणा से त्रिपुरसूदन भगवान शिव ने उस राक्षस बालक को उसकी माता के समान युवा बना दिया।॥28 1/2॥
 
‘Hearing this, Shiva along with Parvati looked at the crying demon boy. Seeing his pitiable condition, a source of compassion overflowed in the heart of mother Parvati and with her inspiration, Tripursudan Lord Shiva made that demon boy young like his mother.॥ 28 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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