श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 38: श्रीराम के द्वारा राजा जनक, युधाजित्, प्रतर्दन तथा अन्य नरेशों की विदार्इ  »  श्लोक 31-32
 
 
श्लोक  7.38.31-32 
आपृच्छामो गमिष्यामो हृदिस्थो न: सदा भवान्।
वर्तामहे महाबाहो प्रीत्यात्र महता वृता:॥ ३१॥
भवेच्च ते महाराज प्रीतिरस्मासु नित्यदा।
बाढमित्येव राजानो हर्षेण परमान्विता:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
अब हम आपकी अनुमति चाहते हैं। हम अपने नगर को चलेंगे। जैसे आप हमारे हृदय में सदैव निवास करते हैं, वैसे ही हे महाबाहो! हम पर सदैव ऐसा प्रेम बना रहे कि हम आपके प्रेम से युक्त होकर आपके हृदय में निवास करें। तब श्री रघुनाथजी ने हर्ष में भरे हुए उन राजाओं से कहा - 'ऐसा अवश्य होगा।'॥31-32॥
 
‘Now we seek your permission. We will go to our city. Just as you always reside in our hearts, similarly, O mighty-armed one! Such love should always remain on us that we remain filled with love for you and reside in your hearts.’ Then Shri Raghunathji said to those kings filled with joy – ‘It will definitely happen like this.’॥ 31-32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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