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श्लोक 7.38.28-29  |
दिष्टॺा प्रत्याहृता सीता दिष्टॺा शत्रु: पराजित:॥ २८॥
एष न: परम: काम एषा न: प्रीतिरुत्तमा।
यत् त्वां विजयिनं राम पश्यामो हतशात्रवम्॥ २९॥ |
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| अनुवाद |
| ‘यह हमारे सौभाग्य से ही है कि आप सीता को वापस ले आये और उस बलवान शत्रु को परास्त कर दिया। श्री राम! यही हमारी सबसे बड़ी इच्छा है और हमारे लिए यह बड़े हर्ष की बात है कि आज हम आपको विजयी होते हुए देख रहे हैं और आपके शत्रु समूह का संहार हो गया है।॥ 28-29॥ |
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| ‘It is because of our good fortune that you brought back Sita and defeated that powerful enemy. Shri Ram! This is our biggest desire and it is a matter of great happiness for us that today we are seeing you victorious and your enemy group has been killed.॥ 28-29॥ |
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