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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 7: उत्तर काण्ड
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सर्ग 38: श्रीराम के द्वारा राजा जनक, युधाजित्, प्रतर्दन तथा अन्य नरेशों की विदार्इ
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श्लोक 19
श्लोक
7.38.19
एतावदुक्त्वा चोत्थाय काकुत्स्थ: परमासनात्।
पर्यष्वजत धर्मात्मा निरन्तरमुरोगतम्॥ १९॥
अनुवाद
ऐसा कहकर धर्मात्मा श्री रामजी पुनः अपने ऊँचे आसन से उठे और प्रतर्दंक को हृदय से लगा लिया॥19॥
Saying this, the virtuous Shri Ram again got up from his elevated seat and embraced Pratardanka deeply. 19॥
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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