श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 38: श्रीराम के द्वारा राजा जनक, युधाजित्, प्रतर्दन तथा अन्य नरेशों की विदार्इ  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  7.38.16 
तं विसृज्य ततो रामो वयस्यमकुतोभयम्।
प्रतर्दनं काशिपतिं परिष्वज्येदमब्रवीत्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
अपने चाचा को विदा करके रघुनाथजी ने अपने मित्र काशीराज प्रतर्दन को, जो किसी से नहीं डरते थे, गले लगाया और कहा- ॥16॥
 
After bidding farewell to his uncle, Raghunath embraced his friend, King of Kashi, Pratardana, who was not afraid of anyone, and said - ॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)