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युधाजित् तु तथेत्याह गमनं प्रति राघव।
रत्नानि च धनं चैव त्वय्येवाक्षय्यमस्त्विति॥ १३॥
अनुवाद
तब युधाजित् ने ‘तथास्तु’ कहकर श्री रामचन्द्रजी के वचन स्वीकार किए और कहा - ‘रघुनन्दन! ये सब रत्न और धन सदा आपके पास रहें।’॥13॥
Then Yudhajit accepted the words of Shri Ramachandraji by saying 'Tathastu' and said - 'Raghunandan! May all these gems and wealth remain with you forever.'॥ 13॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥