Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 ramayan 7.35.62-63h: 'वायु ही जगत् का जीवन है। इस समय वायु ने जगत् के सभी जीवों को त्याग दिया है, इसलिए वे सभी निर्जीव होकर लकड़ी और दीवार के समान हो गए हैं।' | ramayan सर्ग 7.35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना । ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड । श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अद्यैव च परित्यक्तं वायुना जगदायुषा॥ ६२॥
अद्यैव ते निरुच्छ्वासा: काष्ठकुडॺोपमा: स्थिता:।
अनुवाद
'वायु ही जगत् का जीवन है। इस समय वायु ने जगत् के सभी जीवों को त्याग दिया है, इसलिए वे सभी निर्जीव होकर लकड़ी और दीवार के समान हो गए हैं।'
‘The wind is the life of the world. At this time the wind has abandoned the living beings of the world, therefore all of them have become lifeless and like wood and walls. 62 1/2.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥