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ramayan 7.35.58-59h: 'लोगों! मैं तुम्हें वह कारण बताता हूँ जिसके कारण वायुदेव क्रोधित हुए हैं और उनकी गति में बाधा डाली है। सुनो। वह कारण सुनने योग्य और उचित है।'   |   ramayan सर्ग 7.35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना  »  श्लोक 58-59h
 
 
श्लोक  7.35.58-59h 
यस्मिंश्च कारणे वायुश्चुक्रोध च रुरोध च॥ ५८॥
प्रजा: शृणुध्वं तत् सर्वं श्रोतव्यं चात्मन: क्षमम्।
 
 
अनुवाद
'लोगों! मैं तुम्हें वह कारण बताता हूँ जिसके कारण वायुदेव क्रोधित हुए हैं और उनकी गति में बाधा डाली है। सुनो। वह कारण सुनने योग्य और उचित है।'
 
‘People! I am telling you the reason for which Vayu Devta has become angry and has obstructed his movement. Listen. That reason is worth listening to and is appropriate.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)