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ramayan 7.35.54-56h: उस समय देवताओं के पेट ऐसे फूल गए थे मानो उन्हें महोदर रोग हो गया हो। वे हाथ जोड़कर बोले - 'प्रभु! स्वामिन्! आपने चार प्रकार के लोगों की रचना की है। आपने हम सबको हमारे जीवन के अधिपति के रूप में वायुदेव को अर्पित कर दिया है। हे महामुनि! ये वायुदेव हमारे जीवन के देवता हैं, फिर भी क्या कारण है कि आज उन्होंने हमारे शरीर के भीतर स्त्रियों की भाँति अपना रक्त-संचार बंद कर दिया है और इस प्रकार हमारे लिए दुःखदायी बन गए हैं।'   |   ramayan सर्ग 7.35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना  »  श्लोक 54-56h
 
 
श्लोक  7.35.54-56h 
ऊचु: प्राञ्जलयो देवा महोदरनिभोदरा:।
त्वया तु भगवन् सृष्टा: प्रजा नाथ चतुर्विधा:॥ ५४॥
त्वया दत्तोऽयमस्माकमायुष: पवन: पति:।
सोऽस्मान् प्राणेश्वरो भूत्वा कस्मादेषोऽद्य सत्तम॥ ५५॥
रुरोध दु:खं जनयन्नन्त:पुर इव स्त्रिय:।
 
 
अनुवाद
उस समय देवताओं के पेट ऐसे फूल गए थे मानो उन्हें महोदर रोग हो गया हो। वे हाथ जोड़कर बोले - 'प्रभु! स्वामिन्! आपने चार प्रकार के लोगों की रचना की है। आपने हम सबको हमारे जीवन के अधिपति के रूप में वायुदेव को अर्पित कर दिया है। हे महामुनि! ये वायुदेव हमारे जीवन के देवता हैं, फिर भी क्या कारण है कि आज उन्होंने हमारे शरीर के भीतर स्त्रियों की भाँति अपना रक्त-संचार बंद कर दिया है और इस प्रकार हमारे लिए दुःखदायी बन गए हैं।'
 
‘At that time the bellies of the gods had swelled up as if they had contracted the disease of Mahodar. They folded their hands and said – ‘Lord! Swamin! You have created four kinds of people. You have offered all of us to Vayudev as the ruler of our life. O great saint! This Vayudev is the God of our lives, yet what is the reason that today he has stopped his circulation inside our bodies like the women in the inner chambers and thus has become painful for us. 54-55 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)