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ramayan 7.35.51: वायु के प्रकोप से सब प्राणियों की साँस रुक गई, उनके अंगों के जोड़ टूटने लगे और वे सब लकड़ी के लट्ठों के समान निश्चल हो गए॥51॥   |   ramayan सर्ग 7.35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  7.35.51 
वायुप्रकोपाद् भूतानि निरुच्छ्वासानि सर्वत:।
संधिभिर्भिद्यमानैश्च काष्ठभूतानि जज्ञिरे॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
वायु के प्रकोप से सब प्राणियों की साँस रुक गई, उनके अंगों के जोड़ टूटने लगे और वे सब लकड़ी के लट्ठों के समान निश्चल हो गए॥51॥
 
‘Due to the fury of the wind, all the creatures stopped breathing. The joints of all their limbs started breaking and they all became motionless like wooden logs.॥ 51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)