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ramayan 7.35.42: उस समय सिंहिकापुत्र राहु भयभीत होकर बार-बार "इन्द्र! इन्द्र!" पुकारने लगा और अपने रक्षक इन्द्र से रक्षा करने की प्रार्थना करने लगा। 42.   |   ramayan सर्ग 7.35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  7.35.42 
इन्द्रमाशंसमानस्तु त्रातारं सिंहिकासुत:।
इन्द्र इन्द्रेति संत्रासान्मुहुर्मुहुरभाषत॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
उस समय सिंहिकापुत्र राहु भयभीत होकर बार-बार "इन्द्र! इन्द्र!" पुकारने लगा और अपने रक्षक इन्द्र से रक्षा करने की प्रार्थना करने लगा। 42.
 
At that time Rahu, the son of Simhika, out of fear, began to call out repeatedly, "Indra! Indra!", asking his protector Indra to protect him. 42.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)