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ramayan 7.35.34: हे वासव, हे बल और वृत्रासुर के संहारक! आपने मुझे भूख मिटाने के लिए चन्द्रमा और सूर्य दिए थे; किन्तु अब आपने उन्हें किसी और को दे दिया है। ऐसा क्यों हुआ?॥ 34॥   |   ramayan सर्ग 7.35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  7.35.34 
बुभुक्षापनयं दत्त्वा चन्द्रार्कौ मम वासव।
किमिदं तत् त्वया दत्तमन्यस्य बलवृत्रहन्॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
हे वासव, हे बल और वृत्रासुर के संहारक! आपने मुझे भूख मिटाने के लिए चन्द्रमा और सूर्य दिए थे; किन्तु अब आपने उन्हें किसी और को दे दिया है। ऐसा क्यों हुआ?॥ 34॥
 
O Vaasava, slayer of Bala and Vritraasura! You had given me the Moon and the Sun as a means to satisfy my hunger; but now you have handed them over to someone else. Why has this happened?॥ 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)