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ramayan 7.35.33: वह सिंहिकापुत्र क्रोध में भरकर इन्द्र के भवन में गया और देवताओं से घिरे हुए इन्द्र के सामने उसने भौंहें चढ़ाकर कहा-॥33॥   |   ramayan सर्ग 7.35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  7.35.33 
इन्द्रस्य भवनं गत्वा सरोष: सिंहिकासुत:।
अब्रवीद् भ्रुकुटिं कृत्वा देवं देवगणैर्वृतम्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
वह सिंहिकापुत्र क्रोध में भरकर इन्द्र के भवन में गया और देवताओं से घिरे हुए इन्द्र के सामने उसने भौंहें चढ़ाकर कहा-॥33॥
 
‘That son of Simhika filled with anger went to the palace of Indra and in front of Indra surrounded by the gods, he raised his eyebrows and said -॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)