Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 ramayan 7.35.26: वह सोचने लगा, 'यह वायुपुत्र जिस वेग से ऊँचे आकाश में उड़ रहा है, वह न तो वायु में है, न गरुड़ में, न मन में ही है॥ 26॥ | ramayan सर्ग 7.35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना । ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड । श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
नाप्येवं वेगवान् वायुर्गरुडो न मनस्तथा।
यथायं वायुपुत्रस्तु क्रमतेऽम्बरमुत्तमम्॥ २६॥
अनुवाद
वह सोचने लगा, 'यह वायुपुत्र जिस वेग से ऊँचे आकाश में उड़ रहा है, वह न तो वायु में है, न गरुड़ में, न मन में ही है॥ 26॥
He began to think, 'The speed with which this son of Vayu is flying in the high sky is neither present in the wind, nor in Garuda, nor even in the mind.॥ 26॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥