श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 31: रावण का माहिष्मतीपुरी में जाना और वहाँ के राजा अर्जुन को न पाकर मन्त्रियों सहित उसका विन्ध्यगिरि के समीप नर्मदा में नहाकर भगवान् शिव की आराधना करना  »  श्लोक 28-29
 
 
श्लोक  7.31.28-29 
मामासीनं विदित्वैव चन्द्रायति दिवाकर:॥ २८॥
नर्मदाजलशीतश्च सुगन्धि: श्रमनाशन:।
मद्भयादनिलो ह्येष वात्यसौ सुसमाहित:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
परन्तु मुझे यहाँ विराजमान जानकर वे चन्द्रमा के समान शीतल हो गए हैं। मेरे भय से वायु भी नर्मदा के जल के समान शीतल, सुगन्धित और थकान दूर करने वाली हो गई है तथा अत्यन्त सावधानी और मन्दगति से बह रही है॥ 28-29॥
 
‘But knowing that I am sitting here, they have become as cool as the moon. Due to fear of me, the air too has become cool, fragrant and fatigue-relieving like the water of Narmada and is blowing very cautiously and slowly.॥ 28-29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)