श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 31: रावण का माहिष्मतीपुरी में जाना और वहाँ के राजा अर्जुन को न पाकर मन्त्रियों सहित उसका विन्ध्यगिरि के समीप नर्मदा में नहाकर भगवान् शिव की आराधना करना  »  श्लोक 27-28h
 
 
श्लोक  7.31.27-28h 
उवाच सचिवांस्तत्र सलीलं शुकसारणौ।
एष रश्मिसहस्रेण जगत् कृत्वेव काञ्चनम्॥ २७॥
तीक्ष्णतापकर: सूर्यो नभसो मध्यमास्थित:।
 
 
अनुवाद
फिर वहाँ उन्होंने शुक, सारण तथा अन्य मंत्रियों से खेल-खेल में कहा - 'ये सूर्यदेव इस समय आकाश के मध्य में विराजमान होकर अपनी सहस्रों किरणों से सम्पूर्ण जगत को मानो काँच का बना रहे हैं तथा प्रचण्ड गर्मी दे रहे हैं।
 
Then there he said playfully to Shuka, Saran and other ministers - 'This Sun God is currently sitting in the middle of the sky, making the entire world as if it was glass with his thousands of rays and giving tremendous heat.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)