श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 31: रावण का माहिष्मतीपुरी में जाना और वहाँ के राजा अर्जुन को न पाकर मन्त्रियों सहित उसका विन्ध्यगिरि के समीप नर्मदा में नहाकर भगवान् शिव की आराधना करना  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  7.31.17-18 
नदीभि: स्यन्दमानाभि: स्फटिकप्रतिमं जलम्॥ १७॥
फणाभिश्चलजिह्वाभिरनन्तमिव विष्ठितम्।
उत्क्रामन्तं दरीवन्तं हितवत्संनिभं गिरिम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
'निर्मल जल से प्रवाहित नदियों के कारण विन्ध्यगिरि चंचल जिह्वा और फन वाले सर्प के समान स्थित था। अपनी महान ऊँचाई के कारण वह उच्च लोक को जाता हुआ प्रतीत होता था। हिमालय के समान विशाल और विस्तृत विन्ध्यगिरि अनेक गुफाओं से युक्त प्रतीत होता था।॥17-18॥
 
‘Due to the rivers flowing with crystal clear water, Vindhyagiri was situated like a serpent with a restless tongue and hood. Due to its great height, it appeared to be going to the higher world. As vast and wide as the Himalayas, Vindhyagiri appeared to be dotted with many caves.॥ 17-18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)