श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 31: रावण का माहिष्मतीपुरी में जाना और वहाँ के राजा अर्जुन को न पाकर मन्त्रियों सहित उसका विन्ध्यगिरि के समीप नर्मदा में नहाकर भगवान् शिव की आराधना करना  »  श्लोक 16-17h
 
 
श्लोक  7.31.16-17h 
प्रपातपतितै: शीतै: साट्टहासमिवाम्बुभि:।
देवदानवगन्धर्वै: साप्सरोभि: सकिंनरै:॥ १६॥
स्वस्त्रीभि: क्रीडमानैश्च स्वर्गभूतं महोच्छ्रयम्।
 
 
अनुवाद
'अपने सर्वोच्च शिखर के किनारों से गिरती हुई शीतल जलधाराओं के कारण वह पर्वत जोर-जोर से हंसता हुआ प्रतीत हो रहा था। देवता, दानव, गंधर्व और किन्नर अपनी पत्नियों और अप्सराओं के साथ वहाँ क्रीड़ा कर रहे थे। वह अत्यंत ऊँचा पर्वत अपनी मनोरम शोभा के कारण स्वर्ग के समान शोभायमान हो रहा था।॥16 1/2॥
 
‘The mountain appeared to be laughing loudly because of the cool streams of water falling from the banks of its highest peak. Gods, demons, Gandharvas and Kinnars were playing there with their wives and Apsaras. That very high mountain was looking as beautiful as heaven with its picturesque beauty.॥ 16 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)