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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 7: उत्तर काण्ड
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सर्ग 30: ब्रह्माजी का इन्द्रजित को वरदान देकर इन्द्र को उसकी कैद से छुड़ाना और उनके पूर्वकृत पापकर्म को याद दिलाकर उनसे वैष्णव- यज्ञ का अनुष्ठान करने के लिये कहना, उस यज्ञ को पूर्ण करके इन्द्र का स्वर्ग लोक में जाना
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श्लोक 8
श्लोक
7.30.8
अथाब्रवीन्महातेजा इन्द्रजित् समितिंजय:।
अमरत्वमहं देव वृणे यद्येष मुच्यते॥ ८॥
अनुवाद
तब युद्धविजयी इन्द्रजित् ने स्वयं कहा - 'देव! यदि मुझे इन्द्र को छोड़ना पड़े, तो उसके बदले में मैं अमरता लेना चाहता हूँ ॥8॥
Then the war-victorious Indrajit himself said - 'Dev! If I have to leave Indra, I want to take immortality in return. 8॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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