श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 30: ब्रह्माजी का इन्द्रजित को वरदान देकर इन्द्र को उसकी कैद से छुड़ाना और उनके पूर्वकृत पापकर्म को याद दिलाकर उनसे वैष्णव- यज्ञ का अनुष्ठान करने के लिये कहना, उस यज्ञ को पूर्ण करके इन्द्र का स्वर्ग लोक में जाना  »  श्लोक 50-51h
 
 
श्लोक  7.30.50-51h 
एतदिन्द्रजितो नाम बलं यत् कीर्तितं मया॥ ५०॥
निर्जितस्तेन देवेन्द्र: प्राणिनोऽन्ये तु किं पुन:।
 
 
अनुवाद
रघुनन्दन! यह इन्द्रविजयी मेघनाद का पराक्रम है, जिसका वर्णन मैंने आपसे किया है। उसने तो देवराज इन्द्र को भी परास्त कर दिया था; फिर अन्य प्राणियों की क्या बिसात थी?
 
Raghunandan! This is the power of Indravijayi Meghnad, which I have described to you. He had defeated even Devraj Indra; then what was the status of other creatures? 50 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)