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ramayan 7.30.48-49h: देवेन्द्र! उस यज्ञ से पवित्र होकर तुम पुनः स्वर्ग को प्राप्त करोगे। तुम्हारा पुत्र जयंत उस महायुद्ध में मारा नहीं गया है। उसका नाना पुलोमा उसे समुद्र में ले गया है। वह इस समय उसके पास है।'   |   ramayan सर्ग 7.30: ब्रह्माजी का इन्द्रजित को वरदान देकर इन्द्र को उसकी कैद से छुड़ाना और उनके पूर्वकृत पापकर्म को याद दिलाकर उनसे वैष्णव- यज्ञ का अनुष्ठान करने के लिये कहना, उस यज्ञ को पूर्ण करके इन्द्र का स्वर्ग लोक में जाना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 30: ब्रह्माजी का इन्द्रजित को वरदान देकर इन्द्र को उसकी कैद से छुड़ाना और उनके पूर्वकृत पापकर्म को याद दिलाकर उनसे वैष्णव- यज्ञ का अनुष्ठान करने के लिये कहना, उस यज्ञ को पूर्ण करके इन्द्र का स्वर्ग लोक में जाना  »  श्लोक 48-49h
 
 
श्लोक  7.30.48-49h 
पावितस्तेन यज्ञेन यास्यसे त्रिदिवं तत:।
पुत्रश्च तव देवेन्द्र न विनष्टो महारणे॥ ४८॥
नीत: संनिहितश्चैव आर्यकेण महोदधौ।
 
 
अनुवाद
देवेन्द्र! उस यज्ञ से पवित्र होकर तुम पुनः स्वर्ग को प्राप्त करोगे। तुम्हारा पुत्र जयंत उस महायुद्ध में मारा नहीं गया है। उसका नाना पुलोमा उसे समुद्र में ले गया है। वह इस समय उसके पास है।'
 
Devendra! By being purified by that sacrifice you will again attain heaven. Your son Jayant has not been killed in that great war. His maternal grandfather Puloma has taken him to the ocean. He is with him at present.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)