श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 30: ब्रह्माजी का इन्द्रजित को वरदान देकर इन्द्र को उसकी कैद से छुड़ाना और उनके पूर्वकृत पापकर्म को याद दिलाकर उनसे वैष्णव- यज्ञ का अनुष्ठान करने के लिये कहना, उस यज्ञ को पूर्ण करके इन्द्र का स्वर्ग लोक में जाना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  7.30.44 
तस्यातिथ्यं च कृत्वा वै मत्समीपं गमिष्यसि।
वत्स्यसि त्वं मया सार्धं तदा हि वरवर्णिनि॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
वरवर्णिनी! इनका आतिथ्य करने के बाद तुम मेरे पास आओगी और फिर मेरे साथ रहने लगोगी।'
 
Varavarnini! After hosting them, you will come to me and then you will start living with me.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)