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ramayan 7.30.3: हे रावण! युद्ध में तुम्हारे पुत्र का पराक्रम देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। हे रावण! उसका पराक्रम तो तुम्हारे बराबर या उससे भी अधिक है।   |   ramayan सर्ग 7.30: ब्रह्माजी का इन्द्रजित को वरदान देकर इन्द्र को उसकी कैद से छुड़ाना और उनके पूर्वकृत पापकर्म को याद दिलाकर उनसे वैष्णव- यज्ञ का अनुष्ठान करने के लिये कहना, उस यज्ञ को पूर्ण करके इन्द्र का स्वर्ग लोक में जाना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 30: ब्रह्माजी का इन्द्रजित को वरदान देकर इन्द्र को उसकी कैद से छुड़ाना और उनके पूर्वकृत पापकर्म को याद दिलाकर उनसे वैष्णव- यज्ञ का अनुष्ठान करने के लिये कहना, उस यज्ञ को पूर्ण करके इन्द्र का स्वर्ग लोक में जाना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  7.30.3 
वत्स रावण तुष्टोऽस्मि पुत्रस्य तव संयुगे।
अहोऽस्य विक्रमौदार्यं तव तुल्योऽधिकोऽपि वा॥ ३॥
 
 
अनुवाद
हे रावण! युद्ध में तुम्हारे पुत्र का पराक्रम देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। हे रावण! उसका पराक्रम तो तुम्हारे बराबर या उससे भी अधिक है।
 
Son Ravana! I am very pleased to see your son's bravery in the war. Oh! His valour is equal to yours or even greater than yours.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)