श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 30: ब्रह्माजी का इन्द्रजित को वरदान देकर इन्द्र को उसकी कैद से छुड़ाना और उनके पूर्वकृत पापकर्म को याद दिलाकर उनसे वैष्णव- यज्ञ का अनुष्ठान करने के लिये कहना, उस यज्ञ को पूर्ण करके इन्द्र का स्वर्ग लोक में जाना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  7.30.21 
सोऽहं तासां विशेषार्थं स्त्रियमेकां विनिर्ममे।
यद् यत् प्रजानां प्रत्यङ्गं विशिष्टं तत् तदुद‍्धृतम्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
बहुत विचार करने के बाद मैंने समस्त योनियों में एक विशेष योनि उत्पन्न करने के लिए एक स्त्री की रचना की। उस योनि के प्रत्येक अंग में जो अद्भुत विशेषता और मौलिक सौन्दर्य विद्यमान था, उसे मैंने उसके अंगों में प्रकट किया॥ 21॥
 
‘After much thought, I created a woman to present a unique species among all the other species. Whatever amazing speciality and essential beauty was present in each of the organs of the species, I manifested it in her organs.॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)