श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 30: ब्रह्माजी का इन्द्रजित को वरदान देकर इन्द्र को उसकी कैद से छुड़ाना और उनके पूर्वकृत पापकर्म को याद दिलाकर उनसे वैष्णव- यज्ञ का अनुष्ठान करने के लिये कहना, उस यज्ञ को पूर्ण करके इन्द्र का स्वर्ग लोक में जाना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  7.30.2 
तत्र रावणमासाद्य पुत्रभ्रातृभिरावृतम्।
अब्रवीद् गगने तिष्ठन् सामपूर्वं प्रजापति:॥ २॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्माजी आकाश में खड़े होकर अपने पुत्रों और भाइयों के साथ बैठे हुए रावण के पास गए और उसे कोमल वाणी में समझाते हुए बोले - ॥2॥
 
Brahma, while standing in the sky, went near Ravana who was sitting with his sons and brothers and explained to him in a soft voice and said - ॥2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)