श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 30: ब्रह्माजी का इन्द्रजित को वरदान देकर इन्द्र को उसकी कैद से छुड़ाना और उनके पूर्वकृत पापकर्म को याद दिलाकर उनसे वैष्णव- यज्ञ का अनुष्ठान करने के लिये कहना, उस यज्ञ को पूर्ण करके इन्द्र का स्वर्ग लोक में जाना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  7.30.15 
सर्वो हि तपसा देव वृणोत्यमरतां पुमान्।
विक्रमेण मया त्वेतदमरत्वं प्रवर्तितम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! सभी लोग तपस्या करके अमरता प्राप्त करते हैं; परंतु मैंने अपने पराक्रम से इस अमरता को चुना है।॥15॥
 
O lord! Everyone achieves immortality by performing austerities; but I have chosen this immortality by my valour.'॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)